कल्पना कीजिए, रात के ठीक बारह बजकर तीस मिनट हुए हैं। बाहर हवा दरवाजे को हिला रही है और तभी लकड़ी के दरवाजे पर तीन धीमी दस्तकें सुनाई देती हैं। आप पूछते हैं, “कौन है?” बाहर से एक औरत जवाब देती है, “बाबूजी, बस एक मुट्ठी नमक दे दीजिए।”
पहली नजर में यह कोई छोटी-सी मदद लग सकती है। मगर अगर बाहर खड़ी औरत के पैर जमीन से ऊपर हों, उसके कपड़ों पर बारिश की एक बूँद तक न हो और वह आपको ऐसे नाम से पुकारे जिसे आपने किसी अजनबी को कभी बताया ही न हो, तो क्या आप दरवाजा खोलेंगे?
पहाड़ों के बीच बसे कुसुम गाँव में लोग इस सवाल का जवाब जानते हुए भी देने से डरते थे। वहाँ हर अमावस्या की रात सफेद साड़ी पहने एक औरत किसी घर के सामने आती थी। न वह पैसे माँगती, न रोटी, न छत। उसकी माँग हमेशा एक ही रहती: एक मुट्ठी नमक।
गाँव के लोग कहते थे कि जिसने भी उसकी आवाज का जवाब दिया, उसके जीवन में कोई न कोई अनहोनी जरूर हुई। लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि इतने सालों बाद भी किसी को समझ नहीं आया कि वह औरत चाहती क्या थी।
1. कुनाल की मौत और गाँव पर छाया डर
कुसुम गाँव दिन में शांत और सुंदर दिखाई देता था। पत्थर के पुराने घर, पहाड़ी रास्ते और गाँव के बाहर बना एक वीरान कुआँ उसकी पहचान थे। मगर सूरज ढलते ही खिड़कियाँ बंद होने लगतीं। बच्चे घरों में बुला लिए जाते और बुजुर्ग सबको समझाते कि रात में किसी अनजान आवाज का जवाब न दें।
इस डर की शुरुआत कुनाल की मौत से हुई थी। कुनाल गाँव का हँसमुख, मगर जिद्दी आदमी था। वह भूतों की कहानियों पर हँसता और कहता कि डर इंसान के मन में होता है। जब भी कोई सफेद साड़ी वाली औरत का जिक्र करता, वह मजाक में कहता कि अगर वह सच में है तो सामने आकर दिखाए।
एक रात उसके घर से चीख जैसी आवाज आई। पड़ोसी बाहर निकले, मगर किसी की हिम्मत अंदर जाने की नहीं हुई। सुबह कुनाल अपने कमरे में मृत मिला। दरवाजा अंदर से बंद था और खिड़कियाँ भी ज्यों की त्यों थीं। उसके बिस्तर के पास सफेद नमक बिखरा था, जैसे किसी ने मुट्ठी भरकर फर्श पर गिरा दिया हो।
उसकी पत्नी रीना अपने आठ साल के बेटे समिट को सीने से लगाए बैठी रही। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि कुनाल अब कभी वापस नहीं आएगा। अंतिम संस्कार के बाद गाँव में एक ही सवाल घूमता रहा: अगर औरत कुनाल के लिए आई थी, तो अगली दस्तक किसके दरवाजे पर होगी?
रीना ने उसी दिन गाँव छोड़ने का फैसला किया। जाने से पहले वह यश बाबा के पास पहुँची। बाबा गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति थे और पुराने किस्सों की कई ऐसी बातें जानते थे, जिन्हें दूसरे लोग भूल चुके थे। वह मिट्टी के कटोरे में नमक भर रहे थे।
“बाबा, क्या वह औरत फिर आएगी?” रीना ने पूछा।
यश बाबा ने देर तक कोई जवाब नहीं दिया। फिर बोले, “कुछ आत्माएँ बदला लेने लौटती हैं। और कुछ अपनी ही कहानी भूल जाती हैं। उन्हें यह भी याद नहीं रहता कि वे इस दुनिया में नहीं हैं।”
रीना अपने बेटे को लेकर चली गई। बाबा ने कुनाल के दरवाजे पर नमक की एक रेखा खींच दी और गाँव वालों को रात में उस घर के पास जाने से मना किया। उन्हें लगा कि शायद खतरा टल जाएगा। वह गलत थे।
2. सरपंच के दरवाजे पर तीन दस्तकें
कुछ दिनों तक सब शांत रहा। खेतों में काम शुरू हुआ और दुकानें खुलने लगीं। कई लोगों ने मान लिया कि सफेद साड़ी वाली औरत गाँव छोड़कर चली गई है। फिर एक रात, ठीक बारह बजकर तीस मिनट पर, सरपंच मदन लाल के दरवाजे पर तीन दस्तकें हुईं।
“ठक… ठक… ठक…”
मदन लाल लगभग साठ साल का था। उसने कई मुश्किलें देखी थीं, लेकिन उस रात उसके भीतर अजीब घबराहट उठी। उसने बिस्तर से पूछा, “कौन है?”
बाहर से औरत की धीमी आवाज आई, “बाबूजी, एक मुट्ठी नमक मिलेगा?”
उसे यश बाबा की चेतावनी याद आ गई। उसने दरवाजा न खोलने का फैसला किया। कुछ देर बाद आवाज फिर आई, इस बार और कमजोर: “बहुत भूख लगी है। बस थोड़ा-सा नमक दे दीजिए।”
मदन लाल भगवान का नाम लेने लगा। तभी बाहर से एक बच्चे की आवाज सुनाई दी, “पिताजी, दरवाजा खोलो। मुझे ठंड लग रही है।”
वह उसके बेटे की आवाज थी, जो वर्षों पहले नौकरी के लिए शहर जा चुका था। मदन लाल जानता था कि उसका बेटा गाँव में नहीं है, फिर भी उस आवाज में वही अपनापन था। वह खिड़की के पास गया और पर्दा थोड़ा हटाया। बाहर कोई नहीं था। केवल गीली मिट्टी पर छोटे पैरों के निशान थे और उनके बीच नमक बिखरा था।
तभी उसके पीछे किसी ने फुसफुसाया, “तुमने दरवाजा क्यों नहीं खोला, मदन लाल?”
वह पलटा तो कमरा खाली था। मेज पर रखा नमक का डिब्बा खुला था और उसमें नमक की जगह गीली काली मिट्टी भरी थी। अगले ही पल बत्ती बुझ गई। अँधेरे में धीमे कदम उसके बिस्तर की ओर बढ़े। उसके कान के पास आवाज आई, “तुमने मुझे पहले भी अकेला छोड़ा था।”
अगली सुबह मदन लाल गायब था। दरवाजा अंदर से बंद था, खिड़कियों की कुंडियाँ लगी थीं और उसका सामान वहीं था। केवल दरवाजे के बाहर खींची गई नमक की रेखा टूटी हुई थी।
3. घर के भीतर से बाहर जाते निशान
मदन लाल के गायब होने की खबर फैलते ही यश बाबा उसके घर पहुँचे। जमीन पर बने निशानों को देखकर वह देर तक चुप रहे। फिर बोले, “ये निशान बाहर से अंदर नहीं आए। ये घर के भीतर से शुरू होकर बाहर जा रहे हैं।”
एक युवक ने पूछा, “लेकिन दरवाजा तो अंदर से बंद था। कोई बाहर कैसे गया?” बाबा के पास जवाब नहीं था। तलाश करते हुए वे रसोई तक पहुँचे। वहाँ एक पुराना लकड़ी का संदूक रखा था। धूल की मोटी परत पर किसी ने उँगली से एक नाम लिखा था: अनीता।
बाबा ने संदूक खोलने की कोशिश की, मगर वह नहीं खुला। उन्होंने सबको उसे न छूने की हिदायत दी। उस रात अपनी झोपड़ी में लौटकर उन्होंने पुरानी डायरी निकाली और अनीता का नाम खोजा। कई पन्नों के बाद नाम मिला। उसके नीचे लिखा था: “जिस दिन अनीता को नमक देने से मना किया गया, उसी दिन इस गाँव की शांति टूट गई।”
बाबा को याद आया कि कोई उसे गरीब विधवा कहता था, तो कोई उसके परिवार के साथ हुए अन्याय की बात करता था। मगर पूरी कहानी किसी को मालूम नहीं थी। गाँव ने उसके बारे में किस्से तो बचाकर रखे, पर उसके दुख को समझने की कोशिश नहीं की। बाबा ने तय किया कि अब वह अनीता के अतीत का सच खोजेंगे।
4. रीना का फोन
उसी शाम रीना का फोन आया। उसकी आवाज काँप रही थी। “बाबा, समिट रात से सो नहीं रहा। वह कहता है कि खिड़की के बाहर एक औरत खड़ी है।” रीना अपने मायके पहुँच चुकी थी, जहाँ न जंगल था और न गाँव का पुराना कुआँ। फिर भी वह औरत उसके पीछे आ गई थी।
बाबा ने कहा, “दरवाजा मत खोलना। खिड़की की तरफ मत देखना। अगर वह तुम्हारा या समिट का नाम लेकर बुलाए, तो जवाब मत देना।” तभी फोन पर वही आवाज गूँजी, “बाबूजी, एक मुट्ठी नमक मिलेगा?” फिर एक हल्की हँसी और बच्चे की आवाज सुनाई दी, “माँ, बाबा आ गए।” फोन कट गया।
यश बाबा उसी रात रीना के मायके पहुँचे। मुख्य दरवाजा खुला था और आँगन खाली। कमरे में लालटेन जल रही थी, मगर रीना और समिट कहीं नहीं थे। फर्श पर गीली मिट्टी के निशान खिड़की तक जाते थे, जबकि खिड़की अंदर से बंद थी। उसके नीचे नमक की एक छोटी ढेरी थी।
बाबा ने पीछे मुड़कर देखा। दरवाजे पर सफेद साड़ी वाली औरत खड़ी थी। उसके लंबे बाल नीचे तक लटक रहे थे और कपड़ों से पानी टपक रहा था। “तुम आखिर चाहती क्या हो?” बाबा ने पूछा।
“मैंने तो बस एक मुट्ठी नमक माँगा था,” उसने कहा। उसकी आँखें लाल थीं, मगर उनमें गुस्से के साथ गहरी उदासी भी थी। फिर वह बोली, “अभी एक घर बाकी है।” बाबा को याद आया कि गाँव के आखिरी छोर पर अनीता का पुराना घर था, जो दशकों से खाली पड़ा था।
5. अनीता के पुराने घर का रहस्य
अगली सुबह यश बाबा कुछ भरोसेमंद लोगों के साथ अनीता के घर पहुँचे। गाँव के आखिरी छोर पर खड़ा वह मकान जंगली घास से घिरा था। दरवाजे के कब्जों पर जंग थी और छत का एक हिस्सा ढह चुका था। लोगों का कहना था कि वहाँ रहने आए लोग कुछ ही दिनों में घर छोड़कर चले गए। किसी को रोने की आवाज सुनाई देती, तो किसी को रात में नमक से भरा कटोरा मिलता।
दरवाजा धकेलते ही खुल गया। भीतर धूल जमी थी, एक कोने में टूटी चारपाई थी और बीच कमरे में मिट्टी का छोटा कटोरा रखा था। घर की हर चीज पर धूल थी, मगर कटोरा साफ था। उसके अंदर नमक की एक मुट्ठी रखी थी। बाबा ने हाथ बढ़ाया, तभी पीछे से बच्चे की आवाज आई, “बाबा, अब वह किसी से नमक क्यों नहीं माँगेगी?”
बाबा पलटे, मगर वहाँ कोई नहीं था। मिट्टी पर बने छोटे पैरों के निशान दरवाजे से कटोरे तक आते थे। तभी उनकी नजर दीवार पर लगे पुराने चित्र पर पड़ी। उसमें सफेद साड़ी पहने एक औरत के साथ एक छोटी बच्ची खड़ी थी। तारीख अनीता की मौत से एक दिन पहले की थी। औरत का चेहरा उसी आत्मा जैसा था, मगर बच्ची की आँखें देखकर बाबा के हाथ काँपने लगे। वे समिट की आँखों जैसी थीं।
अचानक दरवाजा बंद हो गया। भीतर औरत की हँसी और बच्चे की खिलखिलाहट गूँजी। गाँव वालों ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, मगर वह अटका हुआ था। कुछ देर बाद वह अपने आप खुल गया। कमरे में कोई नहीं था। कटोरा गायब था और चित्र में बच्ची की आकृति भी मिट चुकी थी।
6. वह नमक जो कभी खत्म नहीं होता
उस दिन के बाद अनीता दिखाई नहीं दी, मगर अजीब घटनाएँ जारी रहीं। किसी घर में नमक का डिब्बा खाली मिलता, जबकि रात को भरा हुआ था। कहीं सूखे मौसम में भी आँगन पर गीले पैरों के निशान उभर आते। गाँव वाले अब हर आवाज से चौंक जाते थे।
एक रात यश बाबा अपनी डायरी में अनीता का नाम लिख रहे थे। जैसे ही कलम ने नाम पूरा किया, लालटेन बुझ गई। अँधेरे में आवाज आई, “बाबा, क्या तुमने मेरी कहानी लिख दी?”
“तुम्हें क्या चाहिए?” बाबा ने पूछा।
“सिर्फ एक मुट्ठी नमक।”
बाबा ने कहा, “तुमने लोगों की जिंदगी बर्बाद कर दी। अब भी नमक क्यों माँगती हो?”
कुछ पल बाद आवाज आई, “जब मेरा पति बीमार था, तब मैंने भी एक मुट्ठी नमक माँगा था। घर में खाने तक की कमी थी। किसी ने मदद नहीं की। अब जब मैं माँगती हूँ, तो सब मुझसे डरते हैं।”
बाबा को पुरानी बात याद आई। अनीता का पति कई दिनों तक बीमार रहा था। उसने पड़ोसियों से सहायता माँगी, लेकिन गाँव वालों ने उसे अकेला छोड़ दिया। पति की मौत के बाद अनीता भी गायब हो गई। किसी ने कहा वह गाँव छोड़ गई, किसी ने कहा कि वह कुएँ में कूद गई। उसका शव कभी नहीं मिला।
“कुनाल ने तो तुम्हें नमक दिया था,” बाबा ने कहा, “फिर उसे क्यों मारा?”
“उसने नमक दिया, मगर मुझे देखा ही नहीं। किसी ने मेरी कहानी याद नहीं रखी। सबको मेरा डर याद है, मेरा नाम नहीं।”
लालटेन फिर जल उठी। कमरे में कोई नहीं था, लेकिन डायरी पर नया वाक्य लिखा था: “जब कोई मुझे पहचान लेगा, तब मेरी तलाश खत्म होगी।”
7. आखिरी दस्तक
कई महीने बीत गए। यश बाबा कमजोर हो गए, मगर रोज अपनी डायरी में गाँव की घटनाएँ लिखते रहे। एक अमावस्या की रात फिर वही तीन दस्तकें सुनाई दीं।
“ठक… ठक… ठक…”
बाहर से आवाज आई, “बाबूजी, एक मुट्ठी नमक मिलेगा?”
बाबा ने कटोरा उठाया और दरवाजे के पास पहुँचे। “अनीता, अगर तुम चाहती हो कि कोई तुम्हें पहचाने, तो अपनी कहानी पूरी होने दो। किसी और को नुकसान मत पहुँचाओ।”
बाहर से सवाल आया, “क्या तुम मुझे पहचानते हो?”
बाबा की आँखें भर आईं। “मैं तुम्हारा नाम जानता हूँ। तुम्हारा दुख भी समझने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन यह नहीं जानता कि तुम्हें शांति कैसे मिलेगी।”
इस बार रोने की आवाज आई। उसमें डर कम और दुख ज्यादा था। बाबा ने दरवाजा खोला। सामने सफेद साड़ी पहने एक थकी हुई औरत खड़ी थी। उसके बाल चेहरे से हटे हुए थे और आँखों में लाल चमक नहीं थी। वह किसी भटकी हुई आत्मा से ज्यादा एक अकेली औरत लग रही थी।
“क्या यह मेरे लिए है?” उसने कटोरे की ओर देखकर पूछा। बाबा ने सिर हिलाया। उसने नमक की चुटकी उठाई और हथेली बंद कर ली। फिर पूछा, “क्या कोई मुझे याद रखेगा?”
“जब तक यह कहानी जिंदा रहेगी, तुम्हारा नाम भी जिंदा रहेगा,” बाबा ने कहा। हवा का तेज झोंका आया, लालटेन बुझ गई और दरवाजे के बाहर सफेद धुंध भर गई। जब बाबा ने दोबारा देखा, वहाँ कोई नहीं था। जमीन पर सिर्फ एक मिट्टी का कटोरा था, जिसमें नमक अब भी भरा था।
8. यश बाबा की आखिरी डायरी
कुछ समय बाद यश बाबा बिस्तर से उठ नहीं पाते थे। अपनी आखिरी रात उन्होंने गाँव के एक युवक को बुलाकर डायरी सौंप दी। “इसे संभालकर रखना। इसमें वह सच है जिसे लोग भूलना चाहते हैं,” उन्होंने कहा।
युवक ने पूछा, “क्या अनीता लौटेगी?” बाबा ने धीमे स्वर में कहा, “शायद उसे अब नमक नहीं चाहिए। शायद उसे कोई चाहिए था जो उसकी पुकार सुन ले।” अगली सुबह बाबा की मृत्यु हो गई।
गाँव वालों ने डायरी पढ़ी। आखिरी पन्ने पर लिखा था कि अनीता नमक से ज्यादा याद किए जाने की चाह रखती थी। नीचे एक चेतावनी भी थी: “अगर कोई उसे फिर भुला देगा, तो वह लौटेगी।”
युवक ने इसे बूढ़े बाबा की कल्पना समझकर डायरी बंद कर दी। उसी रात बारह बजकर तीस मिनट पर उसके दरवाजे पर तीन दस्तकें हुईं। उसने दरवाजा नहीं खोला। सुबह चौखट पर नमक की छोटी-सी ढेरी मिली। नमक के बीच मिट्टी पर एक नाम लिखा था: समिट।
9. समिट के नाम का रहस्य
किसी को पता नहीं था कि रीना और समिट के साथ क्या हुआ था। कुछ कहते थे कि वे किसी दूर शहर में रहने लगे, मगर किसी ने उन्हें फिर नहीं देखा। अब नमक के बीच समिट का नाम मिलने से गाँव में नई चर्चा शुरू हो गई। अनीता के पुराने घर की तस्वीर में बच्ची की आँखें समिट जैसी थीं। क्या दोनों के बीच कोई रिश्ता था? या अनीता उसे अपने साथ ले जाना चाहती थी?
कुछ महीनों बाद एक चरवाहे ने दावा किया कि उसने पुराने कुएँ के पास रीना को देखा। वह किसी से बात कर रही थी। सामने सफेद साड़ी वाली औरत खड़ी थी। दोनों ने एक-दूसरे को देखा, फिर रीना ने हाथ आगे बढ़ाया और औरत ने उसका हाथ थाम लिया। अगले ही पल वे कुएँ के पीछे जाने वाले रास्ते पर गायब हो गईं।
उस रात से कुएँ के पास कभी किसी औरत के रोने, तो कभी बच्चे के हँसने की आवाज आने लगी। और हर अमावस्या की रात, बारह बजकर तीस मिनट पर, गाँव के किसी न किसी दरवाजे पर तीन दस्तकें सुनाई देतीं।
10. वह सवाल जिसका जवाब आज भी किसी के पास नहीं
आज भी कुसुम गाँव के बुजुर्ग अमावस्या की रात बच्चों को बाहर नहीं निकलने देते। वे कहते हैं कि हर अनजान आवाज खतरा नहीं होती, मगर बिना सोचे किसी पुकार का जवाब देना भी ठीक नहीं। कुछ लोग मानते हैं कि अनीता हमेशा से बुरी नहीं थी। वह कभी एक साधारण औरत थी, जिसे सबसे मुश्किल समय में मदद नहीं मिली। उसका दुख गुस्से में बदल गया और फिर उसकी कहानी गाँव के डर का हिस्सा बन गई।
फिर भी सवाल बाकी हैं। अगर अनीता केवल अपनी कहानी सुनाना चाहती थी, तो कुनाल की मौत क्यों हुई? मदन लाल कहाँ गया? और अगर बाबा ने उसे याद रखने का वादा किया था, तो समिट का नाम नमक में किसने लिखा?
कहते हैं, अमावस्या की रात पुराने रास्ते से गुजरते हुए कोई अकेला व्यक्ति सफेद साड़ी वाली औरत को देख सकता है। वह रास्ता नहीं रोकती। वह पीछा भी नहीं करती। बस धीमे से पूछती है, “बाबूजी, एक मुट्ठी नमक मिलेगा?”
कभी-कभी कोई अपना हाथ आगे बढ़ाता है। तब वह नमक लेने से पहले एक सवाल पूछती है: “अगर पूरी दुनिया तुम्हें भूल जाए, तो क्या तुम चाहोगे कि कोई तुम्हारी कहानी याद रखे?”
कहते हैं, जो व्यक्ति इस सवाल का जवाब दे देता है, वह सुरक्षित घर लौट जाता है। मगर उसके भीतर कुछ बदल जाता है। वह किसी अकेले, परेशान या मदद माँगते इंसान को अनदेखा नहीं कर पाता। शायद यही अनीता की कहानी का सबसे बड़ा सबक है। या शायद यह भी गाँव की बनाई हुई एक और कहानी हो। कौन जानता है?
बस इतना याद रखना: अगर आधी रात को तुम्हारे दरवाजे पर तीन दस्तकें हों और बाहर से कोई तुम्हारा नाम लेकर नमक माँगे, तो जवाब देने से पहले एक पल ठहरना। हो सकता है, वह मदद माँग रही हो। और हो सकता है कि उसकी कहानी में तुम्हारा हिस्सा अभी बाकी हो।
समाप्त… या शायद नहीं।
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