जिसे करन वापस लाया था… वह प्रिया नहीं थी
एक प्रेम, एक दर्दनाक हादसा और मौत के बाद शुरू हुई एक ऐसी कहानी, जिसका अंत किसी ने नहीं सोचा था।
कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें पढ़ते समय हमें लगता है कि यह सिर्फ एक डरावनी कहानी है। लेकिन अगर वही कहानी किसी ऐसे इंसान के बारे में हो जिसने अपने किसी बेहद करीबी को खोया हो, तो डर का मतलब बदल जाता है।
करन के लिए भी मौत सिर्फ एक शब्द थी। उसे कभी नहीं लगा था कि एक दिन उसकी पूरी जिंदगी उसी एक शब्द के इर्द-गिर्द घूमने लगेगी।
करन और प्रिया एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। दोनों जानते थे कि उनके परिवार इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने परिवार की इच्छा के खिलाफ जाकर शादी करने का फैसला किया।
शादी से पहले गाँव के पुराने पुरोहित ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी। उन्होंने दोनों की कुंडली देखकर साफ कहा था कि यह विवाह उनके जीवन में भारी संकट ला सकता है।
करन ने उस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया।
उसे लगता था कि प्यार के सामने हर डर छोटा होता है।
एक चेतावनी जिसे करन ने नजरअंदाज कर दिया
पुरोहित की बात सुनने के बाद भी करन ने शादी कर ली। प्रिया ने भी उसका साथ दिया।
शुरुआत में सब कुछ बिल्कुल सामान्य था। दोनों एक छोटे से घर में रहने लगे। उनकी जिंदगी में ज्यादा सुख-सुविधाएँ नहीं थीं, लेकिन दोनों खुश थे।
प्रिया को करन की एक आदत बहुत पसंद थी। जब भी वह परेशान होती, करन उसे हँसाने की कोशिश करता।
एक शाम प्रिया ने मजाक में पूछा,
“अगर मैं तुमसे कभी बहुत दूर चली गई तो?”
करन ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम मुझसे कभी दूर नहीं जा सकती।”
प्रिया मुस्कुराई।
दोनों को नहीं पता था कि कुछ ही समय बाद यह बात उनके जीवन की सबसे दर्दनाक याद बनने वाली थी।
वह बारिश वाली रात
शादी के कुछ महीने बाद करन और प्रिया एक दिन कार से गाँव जा रहे थे। मौसम अचानक खराब हो गया।
आसमान पर काले बादल छा गए और कुछ ही देर में तेज बारिश शुरू हो गई।
सड़क लगभग खाली थी। बारिश के कारण सामने देखना भी मुश्किल हो रहा था। करन ने कार की रफ्तार कम कर दी।
प्रिया खिड़की से बाहर बारिश देख रही थी।
तभी सामने से एक तेज रोशनी दिखाई दी।
एक ट्रक उनकी तरफ तेजी से आ रहा था।
करन ने ब्रेक लगाने की कोशिश की।
कार फिसली।
एक जोरदार टक्कर हुई।
काँच टूटने की आवाज पूरे रास्ते में गूँज गई।
इसके बाद करन को कुछ याद नहीं रहा।
जब उसकी आँखें खुलीं, वह अस्पताल में था।
उसने सबसे पहले प्रिया के बारे में पूछा।
कमरे में मौजूद डॉक्टर ने कुछ पल चुप रहने के बाद उसकी तरफ देखा।
“हमें बहुत अफसोस है… हम उन्हें बचा नहीं सके।”
करन को लगा जैसे किसी ने उसके अंदर की सारी आवाजें बंद कर दी हों।
उस दिन से उसके लिए समय जैसे रुक गया।
करन ने मौत को स्वीकार करने से इनकार कर दिया
प्रिया की मौत के बाद करन के लिए घर भी अजनबी जगह जैसा हो गया था।
हर कमरे में उसे प्रिया की याद आती थी।
रसोई में रखा उसका कप।
कमरे में पड़ी उसकी किताब।
बिस्तर के पास रखी उसकी तस्वीर।
यहाँ तक कि उसके फोन में मौजूद पुरानी आवाजें भी करन के लिए किसी जिंदा इंसान की मौजूदगी जैसी लगती थीं।
वह रोज रात को प्रिया की तस्वीर से बातें करता।
एक रात करीब तीन बजे उसने अचानक अपने कमरे में एक आवाज सुनी।
“करन…”
करन ने तुरंत पीछे देखा।
कमरे में कोई नहीं था।
कुछ सेकंड बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।
“मुझे वापस ले चलो…”
करन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
उसने उस आवाज को प्रिया की आवाज समझ लिया।
यही उसकी सबसे बड़ी भूल थी।
कुछ दिनों बाद उसे एक ऐसे युवक के बारे में पता चला जो कथित रूप से पुरानी तांत्रिक मान्यताओं के बारे में जानता था।
उस युवक ने करन को शव साधना का नाम बताया।
उसने करन को रोकने की कोशिश की।
उसने सिर्फ इतना कहा,
“मृत्यु के बाद किसी को वापस बुलाने की कोशिश मत करना। अगर कोई जवाब देता भी है, तो जरूरी नहीं कि वह वही हो जिसे तुम बुला रहे हो।”
लेकिन करन अपने दुख में इतना डूब चुका था कि उसे कोई चेतावनी सुनाई नहीं दे रही थी।
आधी रात का वह फैसला
एक रात करन अस्पताल की मॉर्च्यूरी पहुँचा।
उसके हाथ काँप रहे थे।
उसे खुद भी पता था कि वह जो करने जा रहा है, वह गलत है।
लेकिन उसके लिए प्रिया को खोना उससे भी बड़ा दर्द था।
वह प्रिया के शव को लेकर पुराने श्मशान घाट की ओर निकल पड़ा।
उस रात आसमान बिल्कुल काला था।
श्मशान में चारों तरफ राख, पुराने पेड़ और बुझी हुई चिताओं के निशान दिखाई दे रहे थे।
करन ने वह साधना शुरू की जिसके बारे में उसे बताया गया था।
शुरुआत में कुछ नहीं हुआ।
फिर अचानक हवा रुक गई।
इतना सन्नाटा छा गया कि करन को अपनी साँसों की आवाज तक सुनाई देने लगी।
कुछ देर बाद उसे लगा कि जमीन पर पड़े शरीर में हलचल हुई है।
उसने ध्यान से देखा।
प्रिया की उँगली हिली थी।
करन की आँखों में उम्मीद लौट आई।
फिर प्रिया का सिर थोड़ा उठा।
और अचानक उसकी आँखें खुल गईं।
करन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।
लेकिन प्रिया उसे देखकर खुश नहीं हुई।
वह बस उसे घूरती रही।
घर वापस आई प्रिया… लेकिन कुछ बदल चुका था
करन प्रिया को घर ले आया।
पहले दिन उसने सोचा कि शायद प्रिया सदमे के कारण शांत है।
लेकिन अगले कुछ दिनों में उसे कई अजीब बातें दिखाई देने लगीं।
प्रिया कभी-कभी घंटों एक ही जगह बैठी रहती।
कभी वह अचानक मुस्कुराने लगती।
कभी रात के समय घर के एक कोने में खड़ी होकर खाली दीवार को देखती रहती।
करन ने एक रात उससे पूछा,
“तुम्हें हमारी शादी याद है?”
प्रिया ने कहा,
“हाँ।”
करन ने राहत की साँस ली।
फिर उसने पूछा,
“हम पहली बार कहाँ मिले थे?”
“मंदिर के पास।”
करन मुस्कुराया।
लेकिन अगला सवाल पूछते ही कमरे का माहौल बदल गया।
“मैंने तुम्हें पहली बार क्या कहा था?”
प्रिया कुछ देर चुप रही।
फिर उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा करन की तरफ किया।
“तुम्हें सच में लगता है कि मैं प्रिया हूँ?”
करन पीछे हट गया।
“क्या मतलब?”
प्रिया मुस्कुराई।
“तुमने मुझे बुलाया था, करन।”
करन की आवाज काँपने लगी।
“तुम प्रिया नहीं हो।”
उसने धीरे से जवाब दिया,
“बहुत देर से समझे।”
उस रात करन को पहली बार एहसास हुआ कि शायद वह अपनी पत्नी को वापस लेकर नहीं आया था।
वह किसी और चीज को अपने घर ले आया था।
आईने ने खोल दिया सबसे बड़ा राज
उस रात करन की नींद अचानक खुल गई।
बाथरूम से पानी गिरने की आवाज आ रही थी।
वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास पहुँचा।
प्रिया आईने के सामने खड़ी थी।
करन ने आईने में देखा।
उसे प्रिया के पीछे एक काली आकृति दिखाई दी।
करन ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
उसने फिर आईने में देखा।
काली आकृति अब भी वहीं थी।
उसकी आँखें बिल्कुल स्थिर थीं।
करन डरकर पीछे हट गया।
तभी प्रिया ने धीरे-धीरे उसकी तरफ देखा।
उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जिसे करन ने पहले कभी नहीं देखा था।
अचानक आईने में एक लंबी दरार पड़ गई।
फिर दूसरी।
और अगले ही पल आईना टूटकर जमीन पर गिर गया।
करन ने नीचे देखा।
काँच के टुकड़ों में उसका अपना चेहरा दिखाई दे रहा था।
लेकिन एक टुकड़े में उसे प्रिया दिखाई दी।
और वह अकेली नहीं थी।
उसके पीछे वही काली आकृति खड़ी थी।
अब करन को किसी और सबूत की जरूरत नहीं थी।
जिसे वह प्रिया समझ रहा था, वह प्रिया नहीं थी।
पुरोहित के पास वापस लौटना पड़ा
करन उसी रात पुरोहित के घर पहुँचा।
पुरोहित ने उसके चेहरे को देखा और बिना कुछ पूछे समझ गए कि उनकी चेतावनी सच हो चुकी थी।
उन्होंने पूछा,
“तुमने वह साधना की थी?”
करन ने सिर झुका दिया।
“मुझे प्रिया चाहिए थी।”
पुरोहित ने कहा,
“प्रिया को वापस नहीं लाया जा सकता। तुमने सिर्फ एक दरवाजा खोला है।”
करन ने पूछा,
“अब क्या होगा?”
पुरोहित ने बताया कि जिस शक्ति ने प्रिया के शरीर का सहारा लिया था, उसे वापस उसी स्थान पर भेजना होगा जहाँ से वह आई थी।
वह स्थान था वही पुराना श्मशान।
अमावस्या की रात सबसे नजदीक थी।
पुरोहित ने करन से कहा कि इस बार वह अकेला नहीं जाएगा।
वे अपने दो शिष्यों के साथ उसके साथ चलेंगे।
अमावस्या की रात
अमावस्या की रात आसमान पूरी तरह अंधेरा था।
करन, पुरोहित और उनके शिष्य प्रिया को लेकर श्मशान पहुँचे।
जैसे ही वे पुराने बरगद के पास पहुँचे, प्रिया अचानक रुक गई।
उसने अपना सिर उठाया।
और फिर वह हँसने लगी।
उसकी हँसी धीरे-धीरे पूरे श्मशान में गूँजने लगी।
हवा तेज हो गई।
पेड़ों की शाखाएँ हिलने लगीं।
आसपास की राख हवा में उड़ने लगी।
पुरोहित ने अपनी प्रार्थना और मंत्रों का जाप शुरू किया।
प्रिया का शरीर धीरे-धीरे असामान्य तरीके से ऊपर उठने लगा।
करन पीछे हट गया।
उसकी आँखें अब इंसानी नहीं लग रही थीं।
वह करन को देखकर बोली,
“तुमने मुझे बुलाया था।”
करन ने काँपते हुए जवाब दिया,
“मैंने प्रिया को बुलाया था।”
उसके चेहरे पर एक डरावनी मुस्कान आई।
“प्रिया को बुलाया था… लेकिन दरवाजा मैंने पार किया।”
आखिरी संघर्ष
पुरोहित ने अपनी साधना और प्रार्थना जारी रखी।
कुछ देर बाद प्रिया के शरीर से एक काली परछाईं अलग होती दिखाई दी।
करन ने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था।
वह परछाईं धीरे-धीरे फैलने लगी।
उसके चारों तरफ हवा जैसे भारी हो गई।
अचानक करन को प्रिया की आवाज सुनाई दी।
“करन… मुझे बचाओ…”
करन एक पल के लिए सब भूल गया।
वह उसकी तरफ बढ़ने लगा।
लेकिन पुरोहित ने उसे रोक दिया।
“रुको! यह प्रिया की आवाज नहीं है।”
करन वहीं रुक गया।
उसने उस आवाज को ध्यान से सुना।
उसे अचानक वह पहली रात याद आ गई जब उसने अपने कमरे में वही आवाज सुनी थी।
“मुझे वापस ले चलो…”
अब उसे सच्चाई समझ आ चुकी थी।
जिस आवाज को वह प्रिया की आवाज समझ रहा था, वह उसी शक्ति की आवाज थी।
उसने करन के दर्द का फायदा उठाया था।
और करन खुद उसे अपने घर तक लेकर आया था।
क्या वह वापस चली गई?
काफी संघर्ष के बाद वह काली परछाईं धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी।
पुरोहित और उनके शिष्यों ने अपनी पूरी कोशिश जारी रखी।
कुछ ही देर में वह आकृति धुएँ की तरह बिखरने लगी।
एक तेज हवा चली।
श्मशान की आग अचानक भड़क उठी।
और अगले ही पल वह आकृति पूरी तरह गायब हो गई।
प्रिया का शरीर जमीन पर गिर गया।
करन दौड़कर उसके पास पहुँचा।
उसने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।
लेकिन इस बार कोई आँखें नहीं खुलीं।
कोई आवाज नहीं आई।
कोई मुस्कान नहीं थी।
करन की आँखों से आँसू निकल आए।
अब उसे सच्चाई समझ आ चुकी थी।
प्रिया कभी वापस आई ही नहीं थी।
करन ने अपनी पत्नी को खो दिया था।
और उसे वापस लाने की कोशिश में उसने एक ऐसी शक्ति को अपने जीवन में आने दिया था, जिसे वह समझ भी नहीं पाया।
लेकिन कहानी का सबसे डरावना हिस्सा अभी बाकी था
पुरोहित और उनके शिष्य वापस जाने लगे।
करन कुछ देर तक वहीं बैठा रहा।
तभी उसकी नजर जमीन पर पड़ी।
श्मशान की राख पर किसी ने उंगली से कुछ लिखा था।
“मैं गई नहीं।”
करन के शरीर में ठंडक दौड़ गई।
उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
फिर उसे दूर से पायल की आवाज सुनाई दी।
छन… छन… छन…
करन ने आवाज की तरफ देखा।
पुराने बरगद के नीचे एक औरत खड़ी थी।
लाल साड़ी।
खुले बाल।
चेहरा आधा अंधेरे में छिपा हुआ।
करन की साँस रुक गई।
वह धीरे-धीरे उसके करीब आई।
फिर उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया।
करन की आँखें फैल गईं।
वह चेहरा प्रिया का था।
लेकिन इस बार करन को कोई भ्रम नहीं हुआ।
उसने उसके पैरों की तरफ देखा।
उसके पैर जमीन को छू ही नहीं रहे थे।
औरत मुस्कुराई।
फिर बहुत धीमी आवाज में बोली,
“तुम्हें लगा था कि तुमने मुझे वापस भेज दिया?”
करन पीछे हट गया।
औरत की मुस्कान और गहरी हो गई।
“मैं तो वहीं थी…”
करन ने चारों तरफ देखा।
लेकिन अब श्मशान में कोई नहीं था।
सिर्फ हवा थी।
पेड़ों की सरसराहट थी।
और पायल की वही आवाज।
छन… छन… छन…
अंतिम सवाल
करन ने काँपते हुए पूछा,
“तुम आखिर चाहती क्या हो?”
औरत कुछ नहीं बोली।
उसने सिर्फ जमीन की राख की तरफ इशारा किया।
करन ने नीचे देखा।
राख पर एक आखिरी संदेश लिखा था।
“जिसे तुमने वापस बुलाया था… वह अभी भी तुम्हारे साथ है।”
करन ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया,
“मुझे वापस ले चलो…”
करन चीख पड़ा।
अगली सुबह गाँव वालों को श्मशान के रास्ते पर सिर्फ उसकी चप्पलें मिलीं।
करन का फिर कभी पता नहीं चला।
आज भी गाँव के बुजुर्ग कहते हैं कि अमावस्या की रात उस पुराने श्मशान के पास से गुजरते समय अगर किसी को पायल की आवाज सुनाई दे…
तो उसे पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए।
क्योंकि हो सकता है कि वहाँ खड़ी औरत सिर्फ किसी की याद न हो।
हो सकता है वह किसी ऐसे दरवाजे से आई हो जिसे किसी इंसान ने कभी खोलना ही नहीं चाहिए था।
मौत के बाद लौटने वाला हर इंसान अपना नहीं होता।
और कभी-कभी सबसे डरावनी चीज मौत नहीं होती…
बल्कि वह होती है जिसे हम मौत के पार से वापस बुला लेते हैं।
यह एक काल्पनिक हॉरर कहानी है। इसमें वर्णित पात्र और घटनाएँ कहानी को मनोरंजक बनाने के उद्देश्य से लिखी गई हैं।
READER THEORIES & DISCUSSIONS
Comments
Post a Comment